भट्का-पथिक
भट्का बहुत
कहीं पहुँचा नही
चलता रहा
सबसे कहा
किसी ने सुना नही
यहाँ हर कोई
पागल -सा घूमता है।
बस अपने आप को
चूमता-सा झूमता है
आखिर कौन इसे
अब समझाएं
सब आँखे मीटे हैं
गूँगें है यहाँ
कैसे कोई गाए
यही सोच कर आज
सब हैं घबराएं
अपने ही सताएं।
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